संदेश

मार्च, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
         बेहया के फूल   मौसम की हर मार को सह कर,  बढ़ते खिलते जाते  प्रतिफल । जीवन पथ के पथिकों को भी,  कुछ डगर नई ये दिखाते हैं।  मिटाने की हर एक कोशिश पर,   फिर -फिर पनप ये जाते हैं ।  सुबह सुहानी हवा से मिलकर, आनंदित होकर मुस्काते हैं । बेहया के ये फूल निराले, जीना सभी  को सिखाते हैं।
 मैं करता हूं नहीं कुछ भी,     मेरा हर काम करते हैं।  मेरे इस दिल के मंदिर में,    प्रभु श्री राम बसते हैं। सच के पथ पर चलकर के,    बड़ी ठोकर मैं खाया हूं।  मेरे हर दर्द का मरहम, मेरे श्री राम  बनते हैं। मैं करता हूं नहीं कुछ भी, मेरा हर काम करते हैं। मुझे इस जग के हंसने की, तनिक परवाह अब ना है। मेरा तो शीश ऊंचा भी, मेरे प्रभु राम करते हैं। मैं करता हूं नहीं कुछ भी, मेरा हर काम करते हैं।  मेरे तो दिल के मंदिर में, मेरे प्रभु राम बसते हैं।
 नेह भरी तेरी एक छुअन से, ममता ने ली मंद अगड़ाई। तू नन्हा सा एक फरिश्ता, जन्म जन्म का रिश्ता है। तेरे अधरों की मुस्कान पे, सारी दुनिया मै बिसराऊं। रंग नहीं थे जीवन में कुछ,     तेरे आगमन से पहले । तू आया तो सतरंगी हो गई, धरती अंबर यह दुनिया ।
 बिना तेरे मेरा जीवन, लगे कितना अधूरा है। जो तुम पास रहते हो,  हर लम्हा लगे पूरा है । मेरी हर सांस में तुम हो,  मेरी हर आस तुमसे है। तेरी चाहत का मौसम है,  हर  एहसास में तुम हो। न तुम बिन जी सकेंगे हम,  तुम बिन मर ना पाएंगे।  तेरी बाहों में रहकर के , लगे सावन का झूला है। बिना तेरे मेरा जीवन, लगे कितना अधूरा है।
 तप तप कर इस जीवन को,  जो भी दधीचि सा बनाएगा। आज नहीं तो कल तय है, वह ही परचम लहरायेगा। तूफानों सी जिद हो जिसमें, अंगारों की तपिश भरी हो, एक रोज यह संभव ही है, वह अमृत सागर पा जाएगा। प्रतिपल वेदना सह-सह कर, नित आगे कदम बढ़ाते जाओ,  जो झुका नहीं हर मुश्किल से,    वह ही इतिहास बनाएगा  । आज नहीं तो कल तय है,  वह ही परचम लहरायेगा।
 जीवन की धारा में बहकर,     उस पार तक जाना होगा। निराधार से जीवन को फिर,      नए रूप में आना होगा।  शांतचित्त से सोच समझ लो,    तुमको कुछ तो पाना होगा। व्यर्थ गवाते समय जा रहे,    खुद को फिर चमकाना होगा। हार में भी कुछ सीख छुपी है,    मन को फिर समझना होगा। जीवन की धारा में बहकर,    उस पार तक जाना होगा।      
 बहुत दिनों से दफन हो रहे, दिल का कोई राज लिखूंगा। सोच सोच मुस्कराओगे तुम, मैं तुम्हारी ही बात लिखूंगा। सुकून भरे इन लम्हो के साथ, जीवन का इतिहास लिखूंगा। खुद से ज्यादा यकीं है तुम पर, इसको ही विश्वास लिखूंगा।  बहुत दिनों से दफन हो रहे, दिल का कोई राज लिखूंगा।
 आज -कल संसार में, कुछ बात ऐसी हो रही,  सूरज निकल रहा है,     मगर रात हो रही है। अपनों के नाम पर तो  रिश्तो का अंबार है।  कुछ चेहरेअपने लगते हैं , पर दिल में व्यापार है।  प्राणों के बीच आत्मा भी, घुट -घुट कर सो रही, लगता है कि मानवता, किसी कोने में रो रही।
         दौड़  दौड़ है यह दौड़ है,  जिंदगी एक दौड़ है। थकना है मना यहां, रुकना है मना यहां,  हिम्मतों की दौड़ है। दौड़ है यह दौड़ है। लक्ष्य पर निगाहें हो, फौलाद भरी बाहें हो, हौसलों की दौड़ है।  दौड़ है यह दौड़ है। जिंदगी एक दौड़ है।
 मेरी कलम ने क्या लिखा ऐसा,  आजकल पूरा बाजार ही गरम है।   महफिल भरी थी शागिर्दों से, सब उसकी तारीफों में मशगूल थे ,    मैंने सच जो दिखाया तभी से, मेरे लिए उसके लफ़्ज़ों में अनल है। सुकू चाहते हो तो निकल आओ, हकीकत की पथरीली जमीनों पर, ईमान बचाकर जो बीते जिंदगी  ईश्वर के लिए यही तो धरम है। मेरी कलम ने क्या लिखा ऐसा  आजकल पूरा बाजार ही गरम है।
 सत्य की आग में जल करके,    हर अग्नि परीक्षा देता हूं।  मैं कल भी तप कर सोना था, मेरी कीमत तो आज भी है। कोई क्या कहता फर्क नहीं,  मैं मस्त परिंदा हूं नभ का, मैं खुद का साथी कल भी था, मेरी यह आदत आज भी है।  झुकता हूं बस उसके आगे,  जो कण कण में बसता है , डर के जीता कल भी ना था  मेरी यह फितरत आज भी है।  मैं कल भी तप कर सोना था, मेरी कीमत तो आज भी है।
  रफ्ता -रफ्ता जिंदगी की,        शाम होने जा रही। जो भी कुछ है अनकहा, उसको भी कह दीजिए।   गिले शिकवे के बाजार को, फैलाओ ना अब इतना। सब कुछ सवार लो अभी       शाम होने जा रही। वादों की  डायरी में, कुछ हिसाब जो है अभी। दिल की आलमारी खोल, पूरा सब कर लीजिए। वक्त कब तक थमा रहेगा,      शाम होने जा रही। रफ्ता- रफ्ता जिंदगी की,      शाम होने जा रही।
 आजकल कुछ रिश्तो के,        मायने बदल रहे हैं।  चेहरे तो अपनों जैसे हैं,  पर अपने बदल रहे हैं।  दोस्तों की कहानियां अब,    किताबों मे रह गई । हकीकत में तो सब अपने,      ठिकाने बदल रहे हैं।  कभी मिलते थे जो दिल से, आज हाल उनका ऐसा है।  मुझे देखकर के अक्सर, वे दरवाजे बदल रहे हैं।
              होली  रंग ,अबीर,गुलाल लेकर आई मन भावन होली। मन के भेद मिटाकर, सबको गले लगाकर, अहंकार को दूर भगाने आई मन भावन होली। बौर से फिर भर गये पेड़, आम की बगिया महकी, रंगों से भर देने को, दौड़ रही बच्चों की टोली । रंग अबीर गुलाल लेकर, आई मनभावन होली।
 नारी तुम शक्ति स्वरूपा हो।  हर कदम पर दर्द को पीकर , अपनों को हरदम सुख देकर , नाजुक सी दिखने वाली,  भावो के रस में बहने वाली , नारी तुम अमृत- रूपा हो। नारी तुम शक्ति स्वरूपा हो। हर रिश्ते की पहचान तुम्हीं से, माता-पिता की शान तुम्हीं से, संगिनी बन कदम बढ़ाती हो, मां का फर्ज भी निभाती हो,  नारी तुम तो बहु-रूपा हो। नारी तुम शक्ति स्वरूपा हो।
 मैं लिखता हूं अगर कुछ भी, वो तेरा ही तराना है।   मेरे हर गीत तुमसे है, इन्हें तुमको सुनाना है। बहुत बेबस बहुत मजबूर, इंसा बन गया हूं मैं। तुम्हारे एक इशारे पर, ये दिल भी हार जाता है।  तुम्हारे बातों में मेरी, कभी-भी जिक्र हो ना हो । मेरी हर बात तुमसे है, जमाना जान जाता है। मैं लिखता हूं अगर कुछ भी, वो तेरा ही तराना है  मेरे हर गीत तुमसे हैं, इन्हें तुमको सुनाना है।
 वसूलों पर मैं जीता हूं, वसूलों पर मैं मरता हूं। मगर मेरी यही आदत, तुम्हें अच्छी नहीं लगती। निभाते तुम भी रिश्ते हो, मगर अंतर बस इतना है  तुम दिमाग से करते,  मगर मैं दिल से मरता हूं। मेरे हर छालों का एहसास, तुम करते भला कैसे।                  तुम्हारे पास गाड़ी है,  मगर मै  पैदल ही चलता हूं । बहुत सोचा बहुत समझा, मगर हर बार ऐसा था। तुम अपनी ज़िद पे जीते थे, तुम्हारी जिद पे हारा हूं। मैं सब कुछ हार के भी ,खुशियों से घर भर रहा अपना। तुम्हें हर जीत हासिल है, मगर दिल फिर भी खाली है।    वसूलों पर मैं जीता हूं, वसूलों पर मैं मरता हूं । मगर मेरी यही आदत तुम्हें अच्छी नहीं लगती।
 कोई गिर रहा हो तो मत समझो , जीवन उसका अब बुझ जाएगा। हो सकता है वह गहरी ऊर्जा लेकर,  नया सूरज खुद ही उगाएगा।  किसी की भीख से भूख है भली,  यह वक्त भी यूं गुज़र जायेगा। दर्द का ये मौसम बदल जाएगा, मंजिल को पाकर तू मुस्कुराएगा। मत सोचो कभी हार होगी तेरी, ये तो आता जाता इम्तिहान है। गिर गिर के जो उठ रहा,   जग में चमका वही इंसान हैं।
 जीवन की राहों पर जब,  रात समझ आने लगे,  अपने भी मुंह मोड़ ले, ये बात समझ आने लगे। हर मोड़ पे पत्थर ही बरसे, उम्मीद का ना हो नामो निशा, तुम खुद को उस पर छोड़ भी दो, जब विश्वास समझ आने लगे।  रगड़ रगड़ कर पत्थर भी,  शालिग्राम बन जाता है,  रुक जाओ कुछ क्षण शांतचित्त, जब बरसात समझ आने लगे।  जीवन की राहों पर जब,  रात समझ आने लगे।
         मेरे  राम  मेरे अंतर मन में, इस जग के कण-कण में,            तुम ही जन्मोजन्म से हो राम । तेरी ही धुन हो,तेरी ही लय में  बीते मेरे जीवन की सुबह-शाम  फूलों में ,कलियों में, बागों और गलियों में, चिड़ियों के धुन में भी गूंजे सदा तेरा गान। तेरे चरण की रज से, पत्थर भी इंसान बनें  कुछ ऐसा ही कर दो प्रभु जपता रहूं तेरा नाम। जग के अंधेरों से मैं ना डरू,आगे हमेशा बढूं, नेकी के रास्ते पे चल के  करता रहूं सारे काम । मेरे अंतर मन में इस जग के कण-कण में,              तुम ही जन्मो- जन्म से हो राम।              
              मृत्यु  मृत्यु एक है अटल सत्य,  इसको झुठला ना पाओगे।  यह तो है बस कर्मभूमि,  लौट के घर को आओगे। पाप पुण्य की नाप जोख में, उसको कैसे बेवकूफ बनाओगे।  मृत्यु एक है अटल सत्य,  इसको झुठला ना पाओगे। धृतराष्ट्र बन सत्य दबाकर, कब तक बैठे रह पाओगे।  लाख कमाओ चाहे जितना,  कुछ ना साथ ले जाओगे।  मृत्यु एक है अटल सत्य,  इसको झुठला ना पाओगे।
 कठिनाइयो का दौर भी बीत जाएगा, हिम्मतों से काम ले तू जीत जाएगा। असत्य के तू शोर में दबना नहीं प्यारे, सत्य की शंखनाद बन तू जीत जाएगा। बाजुओं में बल भरा कमजोर नहीं है,  खुद को तू पहचान ले तू जीत जाएगा। कारवां बदल रहा, बदलती जिंदगी , शिव का प्रतिमान है तू जीत जाएगा। आधियों से डर नहीं लड़ना अभी तुझे आंधियों में बढ़ता जा तू जीत जाएगा। कठिनाइयों का दौर भी बीत जाएगा, हिम्मतों से काम ले तू जीत जाएगा।
 हालात ही कुछ ऐसे थे, घर से निकल पड़े।  गिरते गिरते ऐसे ही खुद ही संभल पड़े। तानो की बरसात भी ऐसे हुई थी, जीवन को छोड़कर हम जीने निकल पड़े। रास्ते में फूल तो मिलते नहीं ,कभी कांटों से ही दामन अपना सीने निकल पड़े। वक्त का वह दौर भी देखा है दोस्तों,  अपने भी निगाहों से, बच के निकल पड़े।  सब कुछ बदल गया है हालात नये है, अब मामला अलग है हम आगे निकल पड़े। 
        पुरुष  पुरुष होना आजकल कठिन बात है।  उम्मीदों के बोझ से दबाया जाता है पुरुष। कामयाबी नाकामयाबी के तराजू में,  पूरी दुनिया के द्वारा तौला जाता है पुरुष। जीवन के दर्द से कभी थक हार कर,  सबसे छुप कर अकेले ही रोता है पुरुष। कहीं मां ,कहीं बहन ,कहीं पत्नी व परिवार, अपने हर रिश्ते के लिए जीता है पुरुष। छोटी- मोटी बातों को यूं ही सह लेता है, बहुत तोड़ने पर ही टूटा है पुरुष। यूं ही नहीं कोई अलविदा कहता है,  प्रताड़ना का शिकार भी होता है पुरुष।