वसूलों पर मैं जीता हूं, वसूलों पर मैं मरता हूं।

मगर मेरी यही आदत, तुम्हें अच्छी नहीं लगती।

निभाते तुम भी रिश्ते हो, मगर अंतर बस इतना है 

तुम दिमाग से करते,  मगर मैं दिल से मरता हूं।

मेरे हर छालों का एहसास, तुम करते भला कैसे।                  तुम्हारे पास गाड़ी है,  मगर मै  पैदल ही चलता हूं ।

बहुत सोचा बहुत समझा, मगर हर बार ऐसा था।

तुम अपनी ज़िद पे जीते थे, तुम्हारी जिद पे हारा हूं।

मैं सब कुछ हार के भी ,खुशियों से घर भर रहा अपना।

तुम्हें हर जीत हासिल है, मगर दिल फिर भी खाली है।

   वसूलों पर मैं जीता हूं, वसूलों पर मैं मरता हूं ।

मगर मेरी यही आदत तुम्हें अच्छी नहीं लगती।

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