पिता अपने सुख की आहुति देकर, बच्चों के लिए जो जीता है। मन में लाख दर्द हो लेकिन, कभी व्यक्त न कर पाता है। अपने खून से सीच सीच कर, बच्चों की खुशियां लाता है। दुनिया का एक रिश्ता अनोखा, जो हिम्मत हम में भर जाता है। रात रात भर जाग जाग कर, बच्चों का भविष्य सजाता है। मां के बलिदान से तनिक कम नहीं, पिता जो जीवन दाता है। निःशब्द हूं तेरे ऋण के आगे, तू जीवन की अमृत गाथा है।
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फ़रवरी, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
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चूहे और चुहिया कि आज हो रही सगाई। हंसी-खुशी से झूम रहे खा रहे सभी मिठाई। चूहे ने पूछा मेरी चुहिया कहां तक की पढ़ाई। सौ तक गिनती बीस पहाड़ा गा तो करूं बड़ाई। बात सुन चूहे की चुहिया मन मे बहुत लजाई। बस चूल्हा और चौका की शिक्षा मां ने दिलाई बात सुन चुहिया की चूहे को दया आई। तुझको शिक्षा मिलेगी अब करेगी संग पढ़ाई। सर्व शिक्षा अभियान ने शिक्षा की ज्योति जलाई।
मनमीत
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मधुर मधुर पायल की रुनझुन, फिर लेकर आओ मनमीत, मन के तार झंकृत कर दे , ऐसा दो जीवन संगीत। प्यासा मन प्यासी यह आंखें, तूफानों से चलती सांसे, मन मंदिर में घिरा अंधेरा, अमर ज्योति जलाओ मीत। मन के तार झंकृत कर दे , ऐसा दो जीवन संगीत। उर में लाखों अरमान लेकर, चलता जाता हूं राहों पर, हाथों में हाथों को देकर, कर दो अमर हमारी प्रीत मन के तार झंकृत कर दे, ऐसा दो जीवन संगीत।
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पापा मुझे मंगा दो कंप्यूटर, बन जाऊं कक्षा में सुपर। ट्यूशन पर छा रही महंगाई, कंप्यूटर करेगा आसान पढ़ाई। व्यर्थ समय मैं नहीं गवाऊंगा, इंटरनेट से खबरें तुम्हें सुनाऊंगा। ज्ञान विज्ञान और जोड़ घटाना , कंप्यूटर का है काम बताना। दुनिया भर की मिलेगी जानकारी आसान होगी जीके की तैयारी। आपको कभी नहीं करुंगा परेशान, दिला दो पापा कंप्यूटर मेरी जान।
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मेरी जान मेरी आन मेरी पहचान बनना, मेरे बेटे अपने कुल की तुम शान बनना। निडर हो जिंदगी खुशहाल हर कदम, तुम हौसलों से भरा एक इंसान बनना। माना की मुश्किलें आती है बहुत ही, उनसे लड़ कर तुम शिवाजी महान बनना । मेरे बेटे अपने कुल की तुम शान बनना। सुकून मिलता है तुम्हें खुश देखकर, अंधी दौड़ का मत तुम इंसान बनना। जीवन हो देश के लिए देश के हो लाल भगत सिंह और चंद्रशेखर महान बनना मेरे बेटे अपने कुल की तुम शान बनना।
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ईश्वर तेरा अंश अगर हूं, कुछ तेरे जैसा बन जाऊं सरल बनूं और सरस बनूं, हे नाथ कृपा इतना करना । जग की रक्षा के लिए शिवा ने, विष का प्याला पी डाला। विश्व की रक्षा की खातिर, मैं भी कुछ ऐसा कर जाऊं। देश प्रेम और धर्म से मेरा, हृदय हमेशा भरा रहे। लोभ मोह से ऊपर उठ, सनातन रंग में रंग जाऊं। ईश्वर तेरा अंश अगर हूं, कुछ तेरे जैसा बन जाऊं।
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पागल मन पागल मन कुछ समझ ना पाए, किन गलियों में घूम रहा है। छोड़ यहां से जाना पड़ता, मंजिल समझ के झूम रहा है। रिश्तो की तो बात ना करना, हर सीने में एक खंजर है। प्रेम की फसले कैसे उगेगी, मानवता ही जब बंजर है। मन के अंदर झांक के देखो, पुण्य पाप सब दिखता है। अब भी वक्त संभल जा प्यारे, क्यों कंकड़ पत्थर ढूंढ रहा है। छोड़ यहां से जाना पड़ता, मंजिल समझ जिसे झूम रहा है।
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कौन आये इमदाद पर, किससे दुआ करें, अच्छा है अपने मर्ज की खुद ही दवा करें। मेरा ख्याल और है दूसरों का कुछ और, हर एक का अपना हक है किसको मना करें। आसान है फरेब जमाने से दोस्तों, मुमकिन है कोई खुद अपने संग दगा करे। जहर बहुत ही फैला है इस जहां में, अपने लिए हम फिर कोई आसमां चुने। अच्छा है अपने मर्ज की खुद ही दवा करें।
काश
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काश अगर काश अगर संभव होता, मैं नन्हा बालक बन जाऊं। रोज सवेरे चिड़ियों के संग , उनकी धुन में मैं गाऊं। तितली के पीछे भाग भाग, मैं मतवाला बन इठलाऊं। बारिश की बूंदों की छम छम में, मैं कागज की नौका तैराऊं। मटर की फलियां तोड़ तोड़ कर, मैं फिर चुपके से छिप जाऊं । कान्हा जैसा मित्र हो मेरा, मैं माखन रोटी खाऊं । काश अगर संभव होता, मैं नन्हा बालक बन जाऊं।
मैं
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अपनी तलाश में मैं रोज निकल रहा हू, अंतरमन मे उपजे द्वंद से लड़ रहा हू। मेरे विचार और है दूसरों के और, पर समय से आगे मैं बढ़ रहा हू। नशा है शायद या इश्क है मेरा, मंजिल की चाह में रोज चल रहा हूं। सूनेपन से अपना पुराना है वास्ता, खामोशियों मे अपनी महफिल सजा रहा हूं। कांटों से भी दोस्ती मैं रखता हूं इस कदर, जब भी चुभे मुझे तो मैं मुस्कुरा रहा हूं।
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क्यों क्यों हर बार सत्य को ही, खुद को साबित करना होता है। क्यों हर बार बेईमानों को, ईमानदारी का तमगा मिलता है। ऐसा क्यों हर बार होता है, अग्नि परीक्षा सीता देती हैं। मानवता की वेदी पर नित, सच्चा मन आहुति देता है। फूंक फूंक कर कदम रखे जो, उसको ही काटे चुभते हैं। भूख प्यास से व्यथित बाल को, एक नहीं निवाला मिलता है। क्यों हर बार सांप को ही, दूध भरा प्याला मिलता है।
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मैं संभल गया हूं लोग कहते हैं मुझसे, आजकल मैं बदल गया हूं। मैं कहता हूं बस इतना, गिरने से संभल गया हूं। रिश्तों के फरेब और, लोगों की मक्कारी से। जाने किस-किस मोड़ से, मैं आगे निकल गया हूं। चापलूसी और दिखावे की, महफिलों से निकल कर। सोए जमीर जगाने का, एक आईना बन गया हूं। गुस्ताखी मेरी यही है, या पागलपन भी शायद। इंसानियत के नाम पर, हर बार पिघल गया हूं।
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ग़ज़ल कल्पना में हकीकत का रंग लाना चाहा। अपनी कल्पना हकीकत में पाना चाहा।। ख्वाबों को उम्मीदों मैं सजाना चाहा। इंतजार में जिंदगी बिताना चाहा।। नादान दिल कर गया गुस्ताखी थोड़ी। हमने कांच के अक्स गले लगाना चाहा।। यू हीभटके हम संसार के रेगिस्तान में। प्यास अपनी रेतों से मिटाना चाहा। मेरी वफा पर कोई इल्जाम ना दे पाए। उनके लिए खुद को मिटाना चाहा।। कभी मिले नहीं हमारे उनके इरादे। बस जमी को आसमां से मिलाना चाहा।।
अपनी कविता बेचूं किसको
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अपनी कविता किसको बेचूं पथिक कहां तक जाएगा तू यह रास्ता जाता है दूर । रिश्तों के बंधन में उलझा, दया प्रेम सब गया है भूल। मैं कब से यहां भटक रहा, अपनी भाव भरी कविता लेकर, भाव विहीन हुआ जग सारा, यह कविता अब बेचूं किसको। रिश्तो के रस खत्म हो गए, सूखी पड़ी है हर एक डाल, आहत है मन देख देख कर, कहीं नहीं मरहम की फुहार। लेकर निकला मर्म स्पर्शी कविता, यह कविता अब बेचूं किसको।