मैं संभल गया हूं 

लोग कहते हैं मुझसे,

आजकल मैं बदल गया हूं। 

मैं कहता हूं बस इतना, 

गिरने से संभल गया हूं। 

रिश्तों के फरेब और, 

लोगों की मक्कारी से। 

जाने किस-किस मोड़ से, 

मैं आगे निकल गया हूं।

चापलूसी और दिखावे की, 

महफिलों से निकल कर।

सोए जमीर जगाने का, 

  एक  आईना बन गया हूं।

गुस्ताखी मेरी यही है, 

या पागलपन भी शायद।

इंसानियत के नाम पर,

हर बार पिघल गया हूं।




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