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मैं कोई नौटंकी तो नहीं

 लोगों को खुश रखना अब, यह मेरी फितरत में नहीं। बहुत संभाले जग के रिश्ते, मैं कोई नौटंकी तो नहीं।  हर बार किसी का हाथ पकड़,  मैं राह दिखाने क्यों आऊं। मेरी भी अपनी मंजिल है, मैं कोई नौटंकी तो नहीं।  अब मैं खुद को अपने तक,  सीमित करना चाह रहा हूं।  मैं सब में शामिल क्यों हूं,  मैं कोई नौटंकी तो नहीं।

कभी तुम पधारो

 कभी तो जमाने से फुर्सत निकालो, मेरे भी तो आंगन कभी तुम पधारो।  उदासी है सड़कों पर पसरा सन्नाटा, लगता है तुम बिन गुम सा गया हूं। कभी तो मिलो और मुझसे कहो,  अकेला कहां तू तेरे साथ मैं हूं। मेरे भी तो आंगन कभी तुम पधारो। कभी तो जमाने से फुर्सत निकालो।  कभी तो मेरे घर भी आ करके देखो , बड़ा ही सुहाना मेरे घर का मौसम। पीपल के पत्तों से बारिश की टप टप, चिड़ियों की मधुरिम गीतों का सरगम। मेरे भी तो आंगन कभी तुम पधारो, कभी तो जमाने से फुर्सत निकालो।

धीरे धीरे

मुझे पग में कांटे बहुत ही चुभे पर, मैं मंजिल तक पहुंचा मगर धीरे-धीरे।  सूरज नहीं बन सका तो हुआ क्या, मैं दीपक ही बनकर जला धीरे-धीरे। मुझे पग में कांटे बहुत ही चुभे पर, मैं मंजिल तक पहुंचा मगर धीरे-धीरे।  थी ख्वाहिश की एक घर बनाऊं कहीं पे, बना भी रहा हूं, मगर धीरे-धीरे। ना धोखा ना हड़पा किसी का कभी कुछ, मैं पहुंचा यहां तक मगर धीरे-धीरे। नहीं कोई पर्वत सा सहारा मेरे पास, मैं हर एक तूफान से लडा धीरे धीरे। छोटी सी कश्ती को लेकर चला हूं,  समंदर भी तैरा मगर धीरे-धीरे। मुझे पग में कांटे बहुत ही चुभे पर, मैं मंजिल तक पहुंचा मगर धीरे-धीरे।

खुद से दूर

 कुछ टूटा सा लगता हूं मैं, कुछ बिखरा सा लगता हूं। मैं अपने अंतर मन से ही, कुछ उखड़ा सा लगता हूं। मन के भीतर कोलाहल है, बाहर शांत बना बैठा हूं। रोज ही खुद को समझाता हूं,  मैं रोज ही खुद से उलझा हूं। कुछ टूटा सा लगता हूं मैं, कुछ बिखरा सा लगता हूं। मुख पर एक मुखौटा ओढ़े, खुश सबको दिख जाता हूं। पर अपने भीतर ही भीतर,  खून के आंसू रोता हूं। कुछ टूटा सा लगता हूं मैं, कुछ बिखरा सा लगता हूं। मैं अपने अंतर मन से ही, कुछ उखड़ा सा लगता हूं।

मेरे घर के रास्ते

 मेरे घर के रास्ते से जब भी वो गुजरा, मुझे ये लगा कुछ तो टूटा कहीं से। न जाने ये कैसी थी, उल्फत अलग सी,  निगाहों से उसने कुछ तो कहा था। अभी भी कहीं कुछ दबी सी पड़ी है , जो चिंगारी सी थी मेरे दिल के भीतर।  उसे भी कहां चैन आता रहा है,  वो गुजरा है अक्सर मेरे घर के रास्ते। महफिल में उसके है शामिल बहुत से,  मगर मेरी महफिल बिना कुछ ना उसके।

भूल गए

 पहले अधर्म जब बढ़ता था,  तुम रूप बदलकर आते थे। हर युग में तुम पैदा होकर,  धर्म  ध्वजा फहराते थे। मैं जन्मा इस कलयुग में , सोचा था तुम भी आओगे। हाथ पकड़ कर मेरा तुम,  भवसागर पार कराओगे। सोचा था प्रभु तुमसे मिल, व्यथा अपनी कह पाऊंगा। पर लगता है तुम इस युग में, अवतरित होना ही भूल गए।

प्रभु

 मैं नित तेरे चरणों में रहूं, तेरा ही ध्यान हमेशा धरु। तू ही तो विघ्न का हर्ता है, तू ही तो पालन कर्ता है। अद्भुत तेरा दरबार प्रभु, जहां रोज नए चमत्कार प्रभु।  कब तक मन विकल रहे मेरा, कब तक मैं तिल तिल रोज मरूं। कुछ ऐसा कर दो जीवन में, पथ आलोकित हो मेरा।  मन के हर कोने-कोने में, बस तेरा ही प्रकाश रहे।  तू ही तो विघ्न का हर्ता है, तू ही तो पालन कर्ता है।
 जीवन रण गर लंबा हो तो, जीत का स्वाद नही आता। वक्त बीत जाने पर सब मिलना, तो भी आनंद नहीं आता। जीवन रण गर लंबा हो तो,जीत का स्वाद नहीं आता। फसल सूख जाने पर जैसे ,बारिश भी चुभने लगती है।  कड़ी धूप में जलते जलते, छाया का सुकून भी नहीं भाता। उम्र बीत जाने पर जैसे, लौट  कर यौवन नहीं आता। वक्त बीत जाने पर सब मिलना, तो भी आनंद नहीं आता।  जीवन रण गर लंबा हो तो, जीत का स्वाद नहीं आता।
 अजब सी कशमकश में ,आजकल जीने लगा इंसान।  परिंदों की भी फड़फड़ाहट से, अब डरने लगा इंसान।  यहां रिश्ते नहीं उगते , यहां बस रेत उड़ती हैं। कहां कब कौन ठोकर मार , तुमसे आगे निकल जाए। इसी एक कशमकश में ,रोज ही मरने लगा इसान। अजब सी कशमकश में आजकल जीने लगा इंसान। लालच स्वार्थ और मोह के, दलदल में फंसकर के। अपने ईमान का सौदा भी, करने लगा इंसान।  अजब सी कशमकश में आजकल जीने लगा इंसान। परिंदों की फड़फड़ाहट से, अब डरने लगा इंसान।

उलझनें

 लाखों उलझनों में मै, इस कदर उलझा हुआ हूं।  जितना सुलझाता हूं मैं,  उलझता चला जाता हूं। सुकून की तलाश में मैं, भटक रहा हूं आजकल।  थके बहुत है पांव मगर, रफ्ता रफ्ता चला जाता हूं।  जितना सुलझाता हूं मैं, उलझता चला जाता हूं। लाखों उलझनों में मैं, इस कदर उलझा हुआ हूं। अपनी बाजार को समेट, सोचता हूं लौट जाऊं। पलके बोझिल सी है, पर सो नहीं पाता हूं।  जितना सुलझाता हूं मैं, उलझता चला जाता हूं।  लाखों उलझन में मै, इस कदर उलझा हुआ हूं।

देवदूत वानर सेना

 मानवता की रक्षा को फिर,       देवदूत सब आए हैं । एक नहीं ये एक हजार हैं, हर चेहरे पे मुस्कान ये लाए है। मानवता की रक्षा को फिर,     देवदूत सब आए हैं। कोई भी असहाय न हो, ना होगा कोई भूखा। शिक्षा से वंचित न कोई, उम्मीद से रोशन जग होगा। मानवता की परिभाषा लिखने,  देवदूत अब आए हैं।  एक नहीं ये एक हजार हैं, हर चेहरे पे मुस्कान ये लाए हैं।

मैं नन्हा सा बच्चा हूं

 मैं नन्हा सा बच्चा हूं। मैं नन्हा सा बच्चा हूं। मन से अभी मैं सच्चा हूं। अकल का थोड़ा कच्चा हूं।  मैं नन्हा सा बच्चा हूं। मेरे सारे रूप निराले, मनमोहक मैं बच्चा हूं  दिल का बहुत ही अच्छा हूं।  मन से अभी मैं सच्चा हूं। मैं नन्हा सा बच्चा हूं।

याद है हमको

 तुम्हारे प्रेम पत्रों के हर अक्षर याद है हमको। गुलाबी स्याही से लिखे फसाने याद है हमको। तुम्हारे प्रेम पत्रों के हर अक्षर याद है हमको। बारिशें आज भी होती मगर वो बात नहीं शायद। तुम्हारे संग जो फिसले थे, वो बारिश याद है हमको। तुम्हारे प्रेम पत्रों के हर अक्षर याद है हमको। नज़ारे अब भी जीवन में मगर ठहरे नहीं कोई। तुम्हारे संग जो देखे थे नजारे याद है हमको। तुम्हारे प्रेम पत्रों के हर अक्षर याद है हमको। तुम्हारे संग गुजारे पल, कभी भूला नहीं हूं मैं। वो इक्कीस से बयालिस की जवानी याद है हमको। तुम्हारे प्रेम पत्रों के हर अक्षर याद है हमको। गुलाबी स्याही से लिखे फंसाने याद है हमको।

तुम्हारे खत

 कभी खत का जमाना था,  कसम से बड़ा सुहाना था। कभी खत जब तुम्हें लिखता, पन्ना भी कम पड़ जाता था। डाकिया टिकट लगाने के पहले,    उठाकर तौल करता था, मुस्कुराता था वो भी, लिफाफा  हाथ में लेकर, उसे अपने जमाने का,  लिफाफा याद आता था। तुम्हारे खत के इंतजार में,   एक एक दिन गुजरता था। जिस रोज मिलता था खत तुम्हारा, मैं दुनिया भूल जाता था।  सबकी नजरों से बचाकर, तकिए के नीचे छुपा करके,  मैं कई कई बार पढ़ता था। कशिश थी कुछ ऐसी की,  मैं सपनों में खो जाता था। कभी खत का जमाना था, कसम से बड़ा सुहाना था।

मैं शिक्षक हूं

 मैं शिक्षक हूं मैं शिक्षा की, अमर एक ज्योति जलाऊंगा।  मरे  अशिक्षा का रावण, फिर ऐसा तीर चलाऊंगा  मैं शिक्षक हूं मैं शिक्षा की,  अमर एक ज्योति जलाऊंगा।  मुझे हर नन्हे कदमों को, शिक्षा मंदिर तक लाना है। चमक जाएगा हर बच्चा,  मुझे दुनिया को दिखाना है।  मैं खुद भी मिट भले जाऊं, मगर ये अभियान चलाऊंगा। जग में नाम हो मेरे भारत का, अब ऐसी अलख जगाऊंगा । मैं शिक्षक हूं मैं शिक्षा की,  अमर एक ज्योति जलाऊंगा।
 शिक्षा एक व्यापार बन गई, शिक्षक लाचार बनाया गया।  जो जग को रोशन करता था,  उस पर आरोप लगाया गया। शिक्षा के मंदिर को हर बार, एक प्रयोगशाला बनाया गया।  मर्ज हो रहे विद्यालय से,  बच्चों की मुस्कान मिटाया गया।  शिक्षक भी भयभीत हुआ,   अब डरा डरा सा रहता है। सरप्लस और मर्ज के रोग से, उसको बीमार बनाया गया।  जो चाबुक चलता प्राइवेट पर,  वह सरकारी पर चलाया गया। शिक्षा एक व्यापार बन गई,  शिक्षक लाचार बनाया गया।