भूल गए
पहले अधर्म जब बढ़ता था,
तुम रूप बदलकर आते थे।
हर युग में तुम पैदा होकर,
धर्म ध्वजा फहराते थे।
मैं जन्मा इस कलयुग में ,
सोचा था तुम भी आओगे।
हाथ पकड़ कर मेरा तुम,
भवसागर पार कराओगे।
सोचा था प्रभु तुमसे मिल,
व्यथा अपनी कह पाऊंगा।
पर लगता है तुम इस युग में,
अवतरित होना ही भूल गए।
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