मैं खुद से दूर हूं
कभी लगता है मैं खुद में नहीं, अपना ही अक्स अधूरा लगता हूं । हर लफ्ज़ में चुप्पी सी घुली है, हर सांस ही बोझिल लगती है। मन के भीतर कोलाहल है, पर बाहर शांत बना बैठा हूं। मैं रोज ही खुद को समझता हूं, पर रोज ही खुद से उलझा हूं। चेहरे पर मुस्कान रखी है, जैसे कोई मुखौटा पहना हो। दिल के कोने में कुछ टूटा है, जिसे छिपा कर सबसे रखा है। कभी खुद से ही सवाल करता हूं, क्यों इतना बदल गया हूं मैं। क्या सच में जी रहा हूं अब, या बस वक्त काट रहा हूं मैं। लेकिन फिर भी कहीं गहराई में, एक नन्ही सी चिंगारी बाकी है। टूटे हुए सपनों की राख तले, कुछ जीने की उम्मीदें बाकी है।