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मैं खुद से दूर हूं

 कभी लगता है मैं खुद में नहीं, अपना ही अक्स अधूरा लगता हूं । हर लफ्ज़  में चुप्पी सी घुली है, हर सांस ही बोझिल लगती है। मन के भीतर कोलाहल है, पर बाहर शांत बना बैठा हूं। मैं रोज ही खुद को समझता हूं, पर रोज ही खुद से उलझा हूं। चेहरे पर मुस्कान रखी है, जैसे कोई मुखौटा पहना हो। दिल के कोने में कुछ टूटा है, जिसे छिपा कर सबसे रखा है। कभी खुद से ही सवाल करता हूं, क्यों इतना बदल गया हूं मैं। क्या सच में जी रहा हूं अब, या बस वक्त काट रहा हूं मैं। लेकिन फिर भी कहीं गहराई में, एक नन्ही सी चिंगारी बाकी है। टूटे हुए सपनों की राख तले, कुछ जीने की उम्मीदें बाकी है।

आखिरी बेला में

 जी भर के रो न पाया मन, तुमसे लिपट कर आखिरी बेला में। दो शब्द भी दिल का कह न पाया , तुमसे लिपट कर आखिरी बेला में। तुम चले गए मैं तलाशता रह गया, रास्ते भर तुम्हारे निशान खोजता रहा । सोचा था अभी नहीं बाद में कह लेंगे, एक हूक सी रह गई आखिरी बेला में। जी भर के रो ना पाया मन , तुमसे लिपट कर आखिरी बेला में। साथ गुजरे लम्हे एक स्वप्न हो गए, एक आहट से टूटता है ध्यान मेरा।  लगता है किसी कोने में मुस्कुरा रहे हो, कुछ अनकही सी रह गई आखिरी बेला में। जी भर के रो ना पाया मन, तुमसे लिपट कर आखिरी बेला में ।
 कृष्ण नाम का अमृत रस है,  जो पिया वहीं अब तक जाना  बचपन में ही कृष्ण नाम से,  खुद को मीरा ने जोड़ लिया। फिर जग के सारे रिश्तों से,  नाता अपना तोड़ लिया। जितनी बार मीरा से कृष्ण को, अलग की कोशिश होती थी। उतना ही वह कृष्णमय  हो, कृष्ण दीवानी होती थी। कृष्ण नाम से मीरा को फिर,  विश्व का प्याला दिया गया। कृष्ण नाम ले विष को पीकर, खुद को अमर बना डाला। हार गया राणा का अहं, इतिहास गवाही देता है। कृष्ण नाम की महिमा ऐसी,  जो तुम प्रीत लगाओगे। आज नहीं तो कल तय है, कृष्ण प्रिये बन जाओगे।
 सफर में मुश्किलें ना हो तो, जिंदगी का मजा नहीं आता।  खुद की कमाई इज्जत का,  एक लफ्ज ही बहुत है ‌। मुफ्त में बहुत मिल जाए  तो भी मजा नहीं आता।  अपने ईमान की सूखी रोटी भी, अमृत की तरह मीठी लगे। मुफ्त की पनीर में भी,  मुझे वह स्वाद नहीं आता।  पहचान मेरी हो कहीं तो, बस मेरे ही नाम से। किसी और का परिचय दूं तो,  वो मजा नहीं आता। सफर में मुश्किलें ना हो,  तो जिंदगी का मजा नहीं आता।
 मैं उगता सूरज आसमान का,  मुझे कब तलक ढक पाओगे। तुम तो उड़ते बादल काले, मुझे कभी मिटा ना पाओगे। पग पग पर कांटे बिखेर कर,  तुम दूर करोगे मंजिल क्या। इतनी तो मेरी आत्म शक्ति है, मैं मंजिल पर चढ़ जाऊंगा। तुम तो उड़ते बादल काले, मुझे मिटा ना पाओगे। मैं उगता सूरज आसमान का, मुझे कब तलक ढक पाओगे।

मित्र

जीवन में जो ज्योति जलाए, हर तम को वह दूर भगाएं। नित आगे बढ़ने का साहस,  हर पल मुझको देता जाए।  जाति भाव से ऊपर उठकर, मित्रता की वह मिसाल बनाए। कृष्ण की भांति हमेशा ही वह, मुझे सत्य की राह दिखाएं। जीवन में जो ज्योति जलाएं,  हर तम को वह दूर भगाएं।