अजब सी कशमकश में ,आजकल जीने लगा इंसान।
परिंदों की भी फड़फड़ाहट से, अब डरने लगा इंसान।
यहां रिश्ते नहीं उगते , यहां बस रेत उड़ती हैं।
कहां कब कौन ठोकर मार , तुमसे आगे निकल जाए।
इसी एक कशमकश में ,रोज ही मरने लगा इसान।
अजब सी कशमकश में आजकल जीने लगा इंसान।
लालच स्वार्थ और मोह के, दलदल में फंसकर के।
अपने ईमान का सौदा भी, करने लगा इंसान।
अजब सी कशमकश में आजकल जीने लगा इंसान।
परिंदों की फड़फड़ाहट से, अब डरने लगा इंसान।
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