धीरे धीरे
मुझे पग में कांटे बहुत ही चुभे पर,
मैं मंजिल तक पहुंचा मगर धीरे-धीरे।
सूरज नहीं बन सका तो हुआ क्या,
मैं दीपक ही बनकर जला धीरे-धीरे।
मुझे पग में कांटे बहुत ही चुभे पर,
मैं मंजिल तक पहुंचा मगर धीरे-धीरे।
थी ख्वाहिश की एक घर बनाऊं कहीं पे,
बना भी रहा हूं, मगर धीरे-धीरे।
ना धोखा ना हड़पा किसी का कभी कुछ,
मैं पहुंचा यहां तक मगर धीरे-धीरे।
नहीं कोई पर्वत सा सहारा मेरे पास,
मैं हर एक तूफान से लडा धीरे धीरे।
छोटी सी कश्ती को लेकर चला हूं,
समंदर भी तैरा मगर धीरे-धीरे।
मुझे पग में कांटे बहुत ही चुभे पर,
मैं मंजिल तक पहुंचा मगर धीरे-धीरे।
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