तुम्हारे खत
कभी खत का जमाना था,
कसम से बड़ा सुहाना था।
कभी खत जब तुम्हें लिखता,
पन्ना भी कम पड़ जाता था।
डाकिया टिकट लगाने के पहले,
उठाकर तौल करता था,
मुस्कुराता था वो भी,
लिफाफा हाथ में लेकर,
उसे अपने जमाने का,
लिफाफा याद आता था।
तुम्हारे खत के इंतजार में,
एक एक दिन गुजरता था।
जिस रोज मिलता था खत तुम्हारा,
मैं दुनिया भूल जाता था।
सबकी नजरों से बचाकर,
तकिए के नीचे छुपा करके,
मैं कई कई बार पढ़ता था।
कशिश थी कुछ ऐसी की,
मैं सपनों में खो जाता था।
कभी खत का जमाना था,
कसम से बड़ा सुहाना था।
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