मेरे घर के रास्ते

 मेरे घर के रास्ते से जब भी वो गुजरा,

मुझे ये लगा कुछ तो टूटा कहीं से।

न जाने ये कैसी थी, उल्फत अलग सी, 

निगाहों से उसने कुछ तो कहा था।

अभी भी कहीं कुछ दबी सी पड़ी है ,

जो चिंगारी सी थी मेरे दिल के भीतर। 

उसे भी कहां चैन आता रहा है, 

वो गुजरा है अक्सर मेरे घर के रास्ते।

महफिल में उसके है शामिल बहुत से, 

मगर मेरी महफिल बिना कुछ ना उसके।

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