शिक्षा एक व्यापार बन गई,

शिक्षक लाचार बनाया गया। 

जो जग को रोशन करता था, 

उस पर आरोप लगाया गया।

शिक्षा के मंदिर को हर बार,

एक प्रयोगशाला बनाया गया। 

मर्ज हो रहे विद्यालय से, 

बच्चों की मुस्कान मिटाया गया। 

शिक्षक भी भयभीत हुआ, 

 अब डरा डरा सा रहता है।

सरप्लस और मर्ज के रोग से,

उसको बीमार बनाया गया। 

जो चाबुक चलता प्राइवेट पर, 

वह सरकारी पर चलाया गया।

शिक्षा एक व्यापार बन गई, 

शिक्षक लाचार बनाया गया।



टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

चूहे जी चले ससुराल

मैं खुद से दूर हूं