खुद से दूर

 कुछ टूटा सा लगता हूं मैं,

कुछ बिखरा सा लगता हूं।

मैं अपने अंतर मन से ही,

कुछ उखड़ा सा लगता हूं।

मन के भीतर कोलाहल है,

बाहर शांत बना बैठा हूं।

रोज ही खुद को समझाता हूं,

 मैं रोज ही खुद से उलझा हूं।

कुछ टूटा सा लगता हूं मैं,

कुछ बिखरा सा लगता हूं।

मुख पर एक मुखौटा ओढ़े,

खुश सबको दिख जाता हूं।

पर अपने भीतर ही भीतर, 

खून के आंसू रोता हूं।

कुछ टूटा सा लगता हूं मैं,

कुछ बिखरा सा लगता हूं।

मैं अपने अंतर मन से ही,

कुछ उखड़ा सा लगता हूं।


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