उलझनें

 लाखों उलझनों में मै, इस कदर उलझा हुआ हूं। 

जितना सुलझाता हूं मैं,  उलझता चला जाता हूं।

सुकून की तलाश में मैं, भटक रहा हूं आजकल। 

थके बहुत है पांव मगर, रफ्ता रफ्ता चला जाता हूं। 

जितना सुलझाता हूं मैं, उलझता चला जाता हूं।

लाखों उलझनों में मैं, इस कदर उलझा हुआ हूं।

अपनी बाजार को समेट, सोचता हूं लौट जाऊं।

पलके बोझिल सी है, पर सो नहीं पाता हूं। 

जितना सुलझाता हूं मैं, उलझता चला जाता हूं। 

लाखों उलझन में मै, इस कदर उलझा हुआ हूं।


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

चूहे जी चले ससुराल

मैं खुद से दूर हूं