निश्चल लोगों की पल पल ही,
धर्म परीक्षा होती रहती है।
कपटी के तो राज बहुत है,
महलों में सोती रहती है।
टूट सकू ना मैं अधर्म से,
आत्म बल मेरा ऊंचा हो।
सोने की लंका की चाह नहीं,
अपने सम्मान की रोटी हो।
बिकने वाला यह जमीर नहीं,
क्या तुम इसे खरीदोगे,
कहीं ऐसा ना हो मेरे कारण,
अपनी लंका भी खो दोगे।
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