पागल मन 

पागल मन कुछ समझ ना पाए, 
किन गलियों में घूम रहा है।
छोड़ यहां से जाना पड़ता, 
मंजिल समझ के झूम रहा है।
रिश्तो की तो बात ना करना, 
हर सीने में एक खंजर है।
प्रेम की फसले कैसे उगेगी,
मानवता ही जब बंजर है।
मन के अंदर झांक के देखो,
पुण्य पाप सब दिखता है।
अब भी वक्त संभल जा प्यारे, 
क्यों कंकड़ पत्थर ढूंढ रहा है। 
छोड़ यहां से जाना पड़ता,
मंजिल समझ जिसे झूम रहा है।

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