ग़ज़ल

कल्पना में हकीकत का रंग लाना चाहा।

अपनी कल्पना हकीकत में पाना चाहा।।

ख्वाबों को उम्मीदों मैं सजाना चाहा।

इंतजार में जिंदगी बिताना चाहा।।

नादान दिल कर गया गुस्ताखी थोड़ी।

हमने कांच के अक्स गले लगाना चाहा।।

यू हीभटके हम संसार के रेगिस्तान में।

प्यास अपनी रेतों से मिटाना चाहा।

मेरी वफा पर कोई इल्जाम ना दे पाए। 

उनके लिए खुद को मिटाना चाहा।।

कभी मिले नहीं हमारे उनके इरादे। 

बस जमी को आसमां से मिलाना चाहा।‌।

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