काश
काश अगर
काश अगर संभव होता,
मैं नन्हा बालक बन जाऊं।
रोज सवेरे चिड़ियों के संग ,
उनकी धुन में मैं गाऊं।
तितली के पीछे भाग भाग,
मैं मतवाला बन इठलाऊं।
बारिश की बूंदों की छम छम में,
मैं कागज की नौका तैराऊं।
मटर की फलियां तोड़ तोड़ कर,
मैं फिर चुपके से छिप जाऊं ।
कान्हा जैसा मित्र हो मेरा,
मैं माखन रोटी खाऊं ।
काश अगर संभव होता,
मैं नन्हा बालक बन जाऊं।
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