पुरुष 

पुरुष होना आजकल कठिन बात है। 
उम्मीदों के बोझ से दबाया जाता है पुरुष।
कामयाबी नाकामयाबी के तराजू में, 
पूरी दुनिया के द्वारा तौला जाता है पुरुष।
जीवन के दर्द से कभी थक हार कर, 
सबसे छुप कर अकेले ही रोता है पुरुष।
कहीं मां ,कहीं बहन ,कहीं पत्नी व परिवार,
अपने हर रिश्ते के लिए जीता है पुरुष।
छोटी- मोटी बातों को यूं ही सह लेता है,
बहुत तोड़ने पर ही टूटा है पुरुष।
यूं ही नहीं कोई अलविदा कहता है, 
प्रताड़ना का शिकार भी होता है पुरुष।

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