हालात ही कुछ ऐसे थे, घर से निकल पड़े।
गिरते गिरते ऐसे ही खुद ही संभल पड़े।
तानो की बरसात भी ऐसे हुई थी,
जीवन को छोड़कर हम जीने निकल पड़े।
रास्ते में फूल तो मिलते नहीं ,कभी
कांटों से ही दामन अपना सीने निकल पड़े।
वक्त का वह दौर भी देखा है दोस्तों,
अपने भी निगाहों से, बच के निकल पड़े।
सब कुछ बदल गया है हालात नये है,
अब मामला अलग है हम आगे निकल पड़े।
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