जीवन की राहों पर जब,
रात समझ आने लगे,
अपने भी मुंह मोड़ ले,
ये बात समझ आने लगे।
हर मोड़ पे पत्थर ही बरसे,
उम्मीद का ना हो नामो निशा,
तुम खुद को उस पर छोड़ भी दो,
जब विश्वास समझ आने लगे।
रगड़ रगड़ कर पत्थर भी,
शालिग्राम बन जाता है,
रुक जाओ कुछ क्षण शांतचित्त,
जब बरसात समझ आने लगे।
जीवन की राहों पर जब,
रात समझ आने लगे।
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