चूहे जी चले ससुराल, पहन के ऐनक, सूट और टाई , बारिश के रिमझिम,मौसम में, चले कूदते नाली नाला। बीच बाजार लिए रसगुल्ला , चल दिए करते हल्ला-गुल्ला। मचल उठे रसगुल्ला देख, खाते चल दिए खुल्लम-खुल्ला। घंटे भर की मेहनत से, खाली हाथ पहुंचे ससुराल। साली उनकी बोली जीजा, मिठाई क्या नहीं खरीदा। मुंह बिचका कर बोले जीजा, बारिश की थी बल्ले बल्ले, नाली में गिर पड़े रसगुल्ले।
मैं उगता सूरज आसमान का, मुझे कब तलक ढक पाओगे। तुम तो उड़ते बादल काले, मुझे कभी मिटा ना पाओगे। पग पग पर कांटे बिखेर कर, तुम दूर करोगे मंजिल क्या। इतनी तो मेरी आत्म शक्ति है, मैं मंजिल पर चढ़ जाऊंगा। तुम तो उड़ते बादल काले, मुझे मिटा ना पाओगे। मैं उगता सूरज आसमान का, मुझे कब तलक ढक पाओगे।
कभी लगता है मैं खुद में नहीं, अपना ही अक्स अधूरा लगता हूं । हर लफ्ज़ में चुप्पी सी घुली है, हर सांस ही बोझिल लगती है। मन के भीतर कोलाहल है, पर बाहर शांत बना बैठा हूं। मैं रोज ही खुद को समझता हूं, पर रोज ही खुद से उलझा हूं। चेहरे पर मुस्कान रखी है, जैसे कोई मुखौटा पहना हो। दिल के कोने में कुछ टूटा है, जिसे छिपा कर सबसे रखा है। कभी खुद से ही सवाल करता हूं, क्यों इतना बदल गया हूं मैं। क्या सच में जी रहा हूं अब, या बस वक्त काट रहा हूं मैं। लेकिन फिर भी कहीं गहराई में, एक नन्ही सी चिंगारी बाकी है। टूटे हुए सपनों की राख तले, कुछ जीने की उम्मीदें बाकी है।
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