शिकायत नहीं है

 मुझे कंकड़ों से शिकायत नहीं है,

मेरी भूख थी जो निगलना पड़ा है।

मैं कांटों में पैदा हुई तो नहीं पर,

मुझे इनको अपना बनाना पड़ा है।

मैं हालात से हर कदम ही लड़ी हूं ,

मुझे गिर के अक्सर सभलना पड़ा है।

मुझे कंकड़ों से शिकायत नहीं है,

मेरी भूख थी जो निगलना पड़ा है।

मैं चलती रही पाव छालों को लेकर,

मुझे पत्थरों पर ही चलना पड़ा है। 

कड़ी धूप में मैं जली भी हूं अक्सर,

मुझे फिर भी कोई गिला तक नहीं है।

समझते हैं कमजोर शायद जो हमको,

मेरे आत्म बल से वो परिचित नहीं है।

मैं चट्टान सी अडिग हूं हमेशा ही,

नदियों की धारा को भी मुड़ना पड़ा है।

मुझे कंकड़ों से शिकायत नहीं है,

मेरी भूख थी जो निगलना पड़ा है।

                      प्रियंका विवेक सिंह 


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