गजल
ख्वाहिशें मिट गई जहां की मनमानी में ।
वो बेवा बन गई भरी जवानी में ।।
सुलगती है एक आग सी सीने में कहीं।
धुआं धुआं सा लग रहा जिंदगानी में।।
वो बेवा बन गई भरी जवानी में।
मुमकिन न हुआ फिर चेहरे पे तबस्सुम।
दर्द ही मिलते रहे उसे हर रवानी में।।
वो बेवा बन गई भरी जवानी में।
रूह की आवाज दब कर रह गई ।
खामोशी हमसफर बनी हर कहानी में।।
उजड़े चमन सा लगता है चेहरा उसका।
नूर गुम गया जैसे किसी विरानी में।।
वो बेवा बन गई भरी जवानी में।
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