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कर्ण

 सूर्यपुत्र होकर सूत पुत्र कहलाया, हर द्वार हर गली से तिरस्कार ही पाया। मैं मित्र को कभी भी धोखा नहीं दूंगा, जो वचन दिया तुझे, उससे भी न हटूंगा। ममता भी कुटिल हो गई , कभी पुत्र ना कह पाई। अपने पांच पुत्रों के लिए, आज द्वार मेरे आई। लो दे रहा वचन कर्ण, तेरे पांच रहेंगे। अर्जुन या कर्ण में से कोई एक मरेंगे। लौट जाओ अब, यहां कुछ और ना होगा। यह युद्ध बिना परिणाम के,खत्म ना होगा। तुमने अगर पुत्र मुझे मान लिया होता। सत्य कह रहा हूं मां,यह महाभारत नहीं होता।              प्रियंका विवेक सिंह

शिकायत नहीं है

 मुझे कंकड़ों से शिकायत नहीं है, मेरी भूख थी जो निगलना पड़ा है। मैं कांटों में पैदा हुई तो नहीं पर, मुझे इनको अपना बनाना पड़ा है। मैं हालात से हर कदम ही लड़ी हूं , मुझे गिर के अक्सर सभलना पड़ा है। मुझे कंकड़ों से शिकायत नहीं है, मेरी भूख थी जो निगलना पड़ा है। मैं चलती रही पाव छालों को लेकर, मुझे पत्थरों पर ही चलना पड़ा है।  कड़ी धूप में मैं जली भी हूं अक्सर, मुझे फिर भी कोई गिला तक नहीं है। समझते हैं कमजोर शायद जो हमको, मेरे आत्म बल से वो परिचित नहीं है। मैं चट्टान सी अडिग हूं हमेशा ही, नदियों की धारा को भी मुड़ना पड़ा है। मुझे कंकड़ों से शिकायत नहीं है, मेरी भूख थी जो निगलना पड़ा है।                       प्रियंका विवेक सिंह