औरत

 दीवारों से घिरी दहलीजों की, 

लक्ष्मण रेखा में रहने वाली।  

सर पर घूंघट सम्मान का रख,

सबको खुशियां देने वाली।

भूख लगे पर खुद न खाकर

सबसे पहले परिवार खिलाती।

आज अपने घर की ओट से, 

देख रही बिटिया को बढते।

खुद ही खुद को सम्मानित कर, 

उसकी अभिलाषा तृप्त हो जाती।

टूटे समाज के बंधन देख,

अंधेरी राहों को प्रकाश मिल गया।

अपनी मर्जी अपनी इच्छा से 

उड़ने को आकाश मिल गया।



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