खुद को बड़ा सयाना, तुम समझने लगे हो। 

 दूजों का हक दबाकर,  क्यों रखने लगे हो ।

भूखे बच्चों के निवाले तक, न छोड़ते हो तुम।

कुत्तों के जैसी फितरत, क्यों रखने लगे हो। 

घमंड इस शरीर का, तुम इतना कर रहे ।

सांसे भी उसके रहम की, तुम हर पल जी रहे।

एक पल में सांस अटकेगी, बस तड़फाओगे ।

अपने हर किए कर्म को, तुम जी के जाओगे ।

क्यों भर रहे घड़ा तुम, हर रोज पाप का ।

खुद को ईश्वर से ज्यादा, तुम समझने लगे हो। 

दूजों का हक दबाकर, क्यों रखने लगे हो।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

चूहे जी चले ससुराल

मैं खुद से दूर हूं