धधक रही उस ज्वाला में,

कितनों का अरमान जला।

प्यार तपस्या और विश्वास का, 

एक पुतला बन इंसान जला।

उर में लाखोंअरमा लेकर,

क्या-क्या सपने देखे होंगे।

चंद पलों मे उड़ करके,

प्रियजन से फिर मिलना होगा।

क्रूर काल की कला के आगे,

बेबस हो कर इंसान चला ।

धधक  रही उस ज्वाला में,

कितनों का अरमान जला।


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