मां

 तुम पर क्या मै कविता करू, 

मेरे पास शब्दों की कमी सी है।

  जब भी सोचती हूं  कभी ,

  मां का मेरे लिए  संघर्ष ,

इन आखों में आज भी,

  बिखरी हुई नमी सी है ।

  खुद  को भूखा रख जिसने,

अपना निवाला मेरे मुख किया ।

धूप में खुद जल कर भी,

मेरे सिर पर छावं किया  ।

हर पल आगे बढ़ने  का,

हौसला भी  मां ने दिया ।

  आज जो हूं,जहां हूं,

ये सपना भी मां ने दिया ।

मेरी हर धड़कन कर्जदार  है।

मैं  पौधा ,तू मेरी जमी सी है।

तुम पर क्या मैं कविता करू,

मेरे पास शब्दों की कमी सी है।

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