हीरे की चमक हम भी पहचानते तो है, 

वैसे हम पत्थरों के खरीददार नहीं हैं ।

सामने कुछ और है, पीछे का हाल और, 

इंसान का हर रूप हम पहचानते तो हैं। 

वैसे हमारा उनसे सरोकार नहीं है ।

हीरे की चमक हम भी पहचानते तो है, 

वैसे हम पत्थरों के खरीददार नहीं हैं।

जब से समझ आया जमाने का ये फरेब,

चेहरे पे नकाब डालकर चलने लगे हैं हम।

वैसे हमारा अब यहां कोई यार नहीं है ।

हीरे की चमक हम भी पहचानते तो है,

वैसे हम पत्थरों के खरीददार नहीं है ।

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