अपनी कविता बेचूं किसको

 अपनी कविता किसको बेचूं 

पथिक कहां तक जाएगा तू 

यह रास्ता जाता है दूर ।

रिश्तों के बंधन में उलझा,

दया प्रेम सब गया है भूल।

मैं कब से यहां भटक रहा, 

अपनी भाव भरी कविता लेकर, 

भाव विहीन हुआ जग सारा, 

यह कविता अब बेचूं किसको।

रिश्तो के रस खत्म हो गए, 

सूखी पड़ी है हर एक डाल,

आहत है मन देख देख कर,

कहीं नहीं मरहम की फुहार।

लेकर निकला मर्म स्पर्शी कविता, 

यह कविता अब बेचूं किसको।



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